ऊॅं विष्णु भगवान ने सतयुग के भक्त प्रहलाद को दिये वचन को पूरा करने तथा बारह करोड़ जीवों का उद्धार करने के लिए एवं द्वापर युग में कृष्ण भगवान द्वारा नन्द बाबा एवं यशोदा माता को दिये वचनों को पूरा करने के लिए कलयुग में पिता श्री लोहट जी पंवार एवं माता हंसा देवी के घर ग्राम पीपासर में विक्रमी सम्वत् 1508 भादो बदी अष्टमी के दिन अवतार लिया । सात वर्ष तक मौन रहकर बाल लीला का कार्य किया, 27 वर्ष तक गायों की सेवा करने व चराने का पवित्र कार्य किया । सम्वत् 1540 चैत सुदी नवमी को पिता श्री लोहट जी पंवार एवं सम्वत् 1540 भादवा की पूर्णिमा को माता हंसा देवी द्वारा निर्वाण को प्राप्त होने पर संसारिक सुख एंव एश्वर्य के संसाधनों को त्यागकर विक्रमी सम्वत् 1542 में समराथल धोरे पर हरी कंकेड़ी के नीचे आसन लगाया तथा 51 वर्ष तक अमृतमयी शब्द वाणी का कथन किया तथा विभिन्न प्रकार के चमत्कार दिखाकर जड़ बुद्धि लोगों को धर्म मार्ग पर लगाकर उनका उद्धार किया ।देश विदेशों में भ्रमण करते हुए लोगों को बिश्नोई पंथ का उपदेश दिया तथा विक्रमी सम्वत् 1593 इस्वी मिंगसर बदी नवमी को अंतर्ध्यान हो गए ।
सम्वत् 1507 ईस्वी में जिस प्रकार से विष्णु भगवान ने लोहट जी पंवार को साधु के वेष में दु्रणपुर (छापर) के जंगल में दर्शन देकर भिक्षा मांगी तथा बिना ब्याई बच्छी का दुध पिया तथा वरदान दिया था एवं गोवलबास में माता हंसा देवी को साधु वेष में दर्शन दिया, भिक्षा प्राप्त की तथा पुत्र वरदान दिया था